रविवार

congratulations for 1st bronze 2024 Olympic paris

congratulations Mannu

मनु भाकर एक प्रसिद्ध भारतीय शूटर हैं जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। उन्होंने युवा उम्र में ही निशानेबाजी में सफलता प्राप्त की और कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते हैं। 

मनु का जन्म हरियाणा के झज्जर जिले के गोरिया गाँव में हुआ है। उनके पिता मरीन इंजीनियर हैं और माँ स्कूल में प्रिंसिपल हैं। बचपन से ही मनु ने निशानेबाजी के साथ-साथ मुक्केबाजी, एथलेटिक्स, स्केटिंग और जूडो कराटे जैसे खेलों में भी भाग लिया। जब मनु की उम्र 18 साल से कम थी, तो उनके पिता ने अपनी नौकरी छोड़ दी और अपनी लाइसेंसी पिस्टल के साथ मनु को प्रशिक्षण के लिए ले जाने लगे। हालाँकि, किसी नाबालिग के लिए सार्वजनिक परिवहन में पिस्टल ले जाना अवैध है।

मनु भाकर को 2012 ओलंपिक के बाद गठित राष्ट्रीय राइफल एसोसिएशन और भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) से समर्थन मिला। इन संस्थाओं ने व्यक्तिगत कोच रखने की व्यवस्था शुरू की, जिसमें प्रसिद्ध शूटर को कोच के रूप में नियुक्त किया जाता है। मनु भाकर को भी भारत के प्रसिद्ध शूटर जसपाल राणा से कोचिंग प्राप्त हुई।

गुरुवार

ज़रा सा नहीं सही समझे ज़िन्दगी में, 8 का सार के पहाड़े की बहुत एहमियत होती है !

 इसे ज़रूर पढ़िए और समझिए सोचिए 
8 x 01 = 08   ...बचपन
8 × 02 = 16   ...जवानी की शुरुआत
8 × 03 = 24   ...शादी की उम्र
8 × 04 = 32   ...बच्चों की ज़िम्मेदारी होना
8 × 05 = 40   ...खुशहाल परिवार
8 × 06 = 48   ...साँसारिक ज़िम्मेदारी और 
                स्वास्थ्य के बिगड़ने की शुरुआत
8 × 07 = 56   ...बुढ़ापे की शुरुआत, 
                रिटायरमेन्ट की तैयारी और 
                वसीयत लिख डालने का समय
8 × 08 = 64   ...रिटायरमेन्ट के बाद कम से कम
                तनाव में रहने का प्रयास और
                सेहत का ख्याल रखना
8 × 09 = 72   ...रोग और स्वास्थ्य सम्बन्धी 
                तकलीफों से सामना, 
                खुद को ज़्यादा से ज़्यादा 
                खुश रखने का प्रयास
8 × 10 = 80   ...पिछले 80 सालों मे जिन मित्रों और सहयोगियों और रिश्तेदारों ने आपका सुख दुःख में भी नहीं छोड़ा, उनके साथ हँसी खुशी जीवन बिताना

*कितना महत्वपूर्ण है 8 का पहाड़ा !**
*इसलिए हँसते रहें,* *हँसाते रहें, प्यार से रहें,*
*परिवार और दोस्तों के सङ्ग रहें !

मंगलवार

इन मंदिरों में आज ही जाइए, यह वर्तमान इतिहास बनने वाला है

मंदिर का इतिहास एक बहुत ही विशाल और विविध विषय है, जिसमें भारत के अनेक प्राचीन, प्रसिद्ध और पावन मंदिरों के बारे में जानना संभव है। मंदिरों का इतिहास में हमें मंदिरों के निर्माण, संरक्षण, पूजा-विधि, महत्व, कहानी, रहस्य, चमत्कार, संस्कृति, कला, वास्तु, समाज-धर्म, आस्था, भक्ति और अन्य पहलुओं के बारे में पता चलता है।

विशेष मंदिर जैसे सोमनाथ मंदिर, बद्रीनाथ मंदिर, सोमनाथ मंदिर, तिरुपति बालाजी मंदिर और करणी माता मंदिर के बारे में कुछ प्रमुख जानकारी नीचे लिखी है, 

सोमनाथ मंदिर
12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला है, सौराष्ट्र में समुद्र के किनारे स्थित है, रीति-रिवाज के मुताबिक प्रति सोमवार को दर्शन अच्छे होते है, प्रलय के समय को सुरक्षा प्रदान करने की क्षमता रखते है। इसका निर्माण सोमराज (Chandradev) ने प्रसन्नता प्राप्ति के लिए कराया था, परन्तु 16वीं शताब्दी ई. में महमूद गजनवी (गजनवी) ने 17 बार मंदिर को लूटा और नष्ट कर दिया।

बद्रीनाथ मंदिर 
भारत के चार चार धाम तीर्थ स्थलों में से एक है। यह भगवान विष्णु को समर्पित है और उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने की थी। यह मंदिर समुद्र तल से 3,133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और बर्फ से ढके पहाड़ों से घिरा हुआ है। मंदिर अप्रैल से नवंबर तक छह महीने के लिए खुला रहता है और सर्दियों के दौरान कठोर मौसम की स्थिति के कारण बंद रहता है। यह मंदिर काले पत्थर से बनी भगवान विष्णु की मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है, जिसे विष्णु के आठ स्वयंभू रूपों में से एक माना जाता है।

तिरुपति बालाजी मंदिर
भारत के सबसे अमीर और सबसे ज्यादा देखे जाने वाले मंदिरों में से एक है। यह भगवान विष्णु के एक रूप भगवान वेंकटेश्वर को समर्पित है, और आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में स्थित है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 9वीं शताब्दी ईस्वी में पल्लव राजवंश द्वारा किया गया था। यह मंदिर वेंकटचला पहाड़ी पर स्थित है, जो शेषचलम पर्वतमाला का हिस्सा है। यह मंदिर अपने लड्डू प्रसादम के लिए प्रसिद्ध है, जिसे भक्तों को आशीर्वाद के रूप में दिया जाता है। यह मंदिर मुंडन की रस्म के लिए भी जाना जाता है, जहां भक्त भगवान के प्रति समर्पण के संकेत के रूप में अपना सिर मुंडवाते हैं।
करणी माता मंदिर
भारत का एक अनोखा और असामान्य मंदिर है। यह करणी माता, एक महिला ऋषि और देवी दुर्गा का अवतार, को समर्पित है और राजस्थान के बीकानेर जिले में स्थित है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 20वीं सदी की शुरुआत में महाराजा गंगा सिंह ने कराया था। यह मंदिर अपने चूहों के लिए प्रसिद्ध है, जिन्हें पवित्र माना जाता है और करणी माता के वंशज के रूप में उनकी पूजा की जाती है। मंदिर में हजारों चूहे हैं, जो परिसर में खुलेआम घूमते हैं और भक्त उन्हें खाना खिलाते हैं। यह मंदिर अपने सफेद चूहों के लिए भी जाना जाता है, जिन्हें शुभ माना जाता है और माना जाता है कि जो लोग उन्हें देखते हैं उनकी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं ।


आप मुझसे किसी भी मंदिर के बारे में पूछ सकते हैं, मैं आपको उसका इतिहास बताने की कोशिश करूंगा।

क्या होता है संत या बाबा ? क्या सब कुछ छोड़ कर बाबा बन जाऊं ? क्या तैयारी करनी पड़ेगी ?

यह सब जानते हैं कि बाबा बनने का निर्णय लेना एक महत्वपूर्ण और जीवन बदल देने वाला कदम होता है। इससे पहले आपको ध्यानपूर्ण विचार करना चाहिए, सभी पहलुओं का विचार करना चाहिए, और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आपका मानसिक और आर्थिक तैयारी पूरी है। बाबा बनने के फैसले को बड़े सावधानीपूर्वक और सोच-विचार करके लेना चाहिए।

अब बात आती है, संत बनूं या बाबा?
"संत" और "बाबा" दो भिन्न शब्द हैं और इनका अर्थ भाषा, संस्कृति और समाज के आधार पर बदल सकता है। यहां कुछ मुख्य भेदों को बताने की कोशिश की है:

1. शब्द का अर्थ: "संत" आमतौर पर एक आध्यात्मिक गुरु या धार्मिक आदर्श को सूचित करने के लिए उपयोग होता है, जबकि "बाबा" आमतौर पर परम पिता या आध्यात्मिक गुरु को सूचित करने के लिए उपयोग होता है।

2. आध्यात्मिक स्थान: संत आध्यात्मिक उन्नति के मार्गदर्शक और आदर्श माने जाते हैं, जबकि बाबा आध्यात्मिक बालकों के आध्यात्मिक पिता के रूप में पूजे जाते हैं।

3. सम्प्रदाय: "संत" शब्द आध्यात्मिक संप्रदायों के आध्यात्मिक गुरुओं को सूचित करने में आम होता है, जबकि "बाबा" शब्द खासतर संतमत सम्प्रदायों जैसे ब्रह्मकुमारी के प्रायः उपयोग किया जाता है।

4. व्यक्तिगत संबंध: "संत" एक आध्यात्मिक गुरु के साथ एक शिष्य का संबंध होता है, जबकि "बाबा" एक आध्यात्मिक पिता के साथ आध्यात्मिक बच्चों का संबंध होता है।

सारांश में, "संत" और "बाबा" के बीच आध्यात्मिक भाषा और संस्कृति के आधार पर भिन्नता हो सकता है, और इन शब्दों का अर्थ समाज और संप्रदाय के आधार पर बदल सकता है।
अब यदि इस संसार में, समाज में और इनकी अच्छी बुरी चीजों को देखना व सुधारना है, फ्री की एडवाइज देनी है तो बाबा बनो और अपने आप को महान बनाना है, जो शरण में आए उसका भला करना है तो संत बन जाओ।
बाबा बनने के फायदे और नुकसान निर्भर करते हैं। यह व्यक्ति के व्यक्तिगत प्राथमिकताओं, संविदानिक आवश्यकताओं और जीवन दृष्टिकोण पर निर्भर करेगा।
फायदे:
1. आध्यात्मिक आनंद: यह आध्यात्मिक सफलता और आंतरिक शांति का माध्यम हो सकता है।
2. सेवा: आपको दूसरों की सेवा करने का मौका मिलता है और उनकी मदद करने का साधु धर्म माना जाता है।
3. आध्यात्मिक शिक्षा: आप आध्यात्मिक ज्ञान और सद्गुणों की शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं।
4. जीवन का सरलीकरण: बाबा बनने से आप जीवन को सरलीकरण करने का मौका प्राप्त कर सकते हैं।
5. समाज में मान्यता: समाज में आपको आदर्श और श्रद्धा के साथ देखा जा सकता है।

नुकसान:
1. सामाजिक प्रतिबंध: बाबा बनने से आपको सामाजिक प्रतिबंध का सामना करना पड़ सकता है।
2. आर्थिक परिस्थितियाँ: आपकी आर्थिक स्थिति पर असर पड़ सकता है, क्योंकि आपको वित्तीय अद्यतन करने की कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
3. व्यक्तिगत जीवन की सीमाएँ: बाबा बनने से आपका व्यक्तिगत जीवन किसी मायके की तरह सीमित हो सकता है।
4. स्वाधीनता की खोज: बाबा बनने से पूरी तरह से स्वाधीनता की खोज में विफल हो सकते हैं, क्योंकि आपको बाबा बनने के बाद किसी आधिकारिक परिपत्र और नियमों का पालन करना पड़ सकता है।

इसलिए, बाबा बनने का निर्णय लेने से पहले आपको इन फायदों और नुकसानों को विचार करके सोचना होगा और यह निर्णय अपने व्यक्तिगत परिस्थितियों के आधार पर लेना होगा।
बाबा बनने के लिए तैयारी करने के लिए  क्या करें:

1. आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति: आध्यात्मिक ज्ञान का अध्ययन करें और आध्यात्मिक गुरुओं से सीखें।

2. आध्यात्मिक साधना: आध्यात्मिक साधना का अभ्यास करें, जैसे कि ध्यान, प्रार्थना, और मानना।

3. सेवा का आभास: दूसरों की सेवा करने का आभास करें और सेवा में लगे रहें।

4. आध्यात्मिक जीवनशैली: आध्यात्मिक जीवनशैली का पालन करें, जैसे कि सात्विक आहार और सत्य के प्रति प्रतिबद्ध रहना।

5. संगठन या सम्प्रदाय: किसी आध्यात्मिक संगठन या सम्प्रदाय का हिस्सा बनें जो बाबा बनने के लिए अधिक सहायक हो सकता है।

6. गुरु का मार्गदर्शन: किसी आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन और शिक्षा का अध्ययन करें और उनके मार्ग पर चलें।

7. स्वाध्याय: स्वयं का आत्ममूल्यांकन करें और आपके आध्यात्मिक यात्रा में सुधार करने के लिए स्वाध्याय करें।

8. सामाजिक परिपत्र और नियमों का पालन: बाबा बनने के सामाजिक परिपत्र और नियमों का पालन करें।

बाबा बनने के लिए तैयारी करने के लिए इन कदमों का अभ्यास करने से आप अपने आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं। ध्यान और समर्पण से इस मार्ग पर चलना महत्वपूर्ण होता है।

गुरुवार

भक्ति की शक्ति: एक कहानी के माध्यम से

आज आपको एक कहानी सुनाता हूं यानी पढ़ाता हूं।

पंडित और एक शिव भक्त की

एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से केदारनाथ धाम की यात्रा पर निकला। पहले यातायात की सुविधाएँ तो थी नहीं, वह पैदल ही निकल पड़ा। रास्ते में जो भी मिलता केदारनाथ का मार्ग पूछ लेता। मन में भगवान शिव का ध्यान करता रहता। चलते चलते उसको महीनो बीत गए। आखिरकार एक दिन वह केदारनाथ धाम पहुंच ही गया।
मंदिर के द्वार 6 महीने खुलते है और 6 महीने बंद रहते है। वह उस समय पर पहुचां जब मन्दिर के द्वार बंद हो रहे थे। पंडित जी को उसने बताया वह बहुत दूर से महीनो की यात्रा करके आया है। पंडित जी से प्रार्थना की – कृपा कर के दरवाजे खोलकर प्रभु के दर्शन करवा दीजिये ।
लेकिन वहां का तो नियम है एक बार बंद तो बंद। नियम तो नियम होता है। वह बहुत रोया। बार-बार भगवान शिव को याद किया कि प्रभु बस एक बार दर्शन करा दो। वह प्रार्थना कर रहा था सभी से, लेकिन किसी ने भी नही सुनी।
पंडित जी बोले अब यहाँ 6 महीने बाद आना, 6 महीने बाद यहां के दरवाजे खुलेंगे। यहाँ 6 महीने बर्फ और ढंड पड़ती है। और सभी जन वहां से चले गये।
वह वही पर रोता रहा। रोते-रोते रात होने लगी चारो तरफ अँधेरा हो गया। लेकिन उसे विश्वास था अपने शिव पर कि वो जरुर कृपा करेगे। उसे बहुत भुख और प्यास भी लग रही थी।
उसने किसी के आने की आहट सुनी। देखा एक सन्यासी बाबा उसकी ओर आ रहा है। वह सन्यासी बाबा उस के पास आया और पास में बैठ गया। पूछा – बेटा कहाँ से आये हो ? उस ने सारा हाल सुना दिया और बोला मेरा आना यहाँ पर व्यर्थ हो गया बाबा जी। बाबा जी ने उसे समझाया और खाना भी दिया। और फिर बहुत देर तक बाबा उससे बाते करते रहे। बाबा जी को उस पर दया आ गयी। वह बोले, बेटा मुझे लगता है, सुबह मन्दिर जरुर खुलेगा। तुम दर्शन जरुर करोगे।
बातो-बातो में इस भक्त को ना जाने कब नींद आ गयी। सूर्य के मद्धिम प्रकाश के साथ भक्त की आँख खुली। उसने इधर उधर बाबा को देखा, किन्तु वह कहीं नहीं थे । इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता उसने देखा पंडित जी आ रहे है अपनी पूरी मंडली के साथ।उस ने पंडित को प्रणाम किया और बोला – कल आप ने तो कहा था मन्दिर 6 महीने बाद खुलेगा ? और इस बीच कोई नहीं आएगा यहाँ, लेकिन आप तो सुबह ही आ गये।
पंडित जी ने उसे गौर से देखा, पहचानने की कोशिश की और पुछा – तुम वही हो जो मंदिर का द्वार बंद होने पर आये थे ? जो मुझे मिले थे। 6 महीने होते ही वापस आ गए !
उस आदमी ने आश्चर्य से कहा – नही, मैं कहीं नहीं गया। कल ही तो आप मिले थे, रात में मैं यहीं सो गया था। मैं कहीं नहीं गया।
पंडित जी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। उन्होंने कहा – लेकिन मैं तो 6 महीने पहले मंदिर बन्द करके गया था और आज 6 महीने बाद आया हूँ। तुम छः महीने तक यहाँ पर जिन्दा कैसे रह सकते हो ?
पंडित जी और सारी मंडली हैरान थी। इतनी सर्दी में एक अकेला व्यक्ति कैसे छः महीने तक जिन्दा रह सकता है। तब उस भक्त ने उनको सन्यासी बाबा के मिलने और उसके साथ की गयी सारी बाते बता दी। कि एक सन्यासी आया था – लम्बा था, बढ़ी-बढ़ी जटाये, एक हाथ में त्रिशुल और एक हाथ में डमरू लिए, मृग-शाला पहने हुआ था।
पंडित जी और सब लोग उसके चरणों में गिर गये। बोले, हमने तो जिंदगी लगा दी किन्तु प्रभु के दर्शन ना पा सके, सच्चे भक्त तो तुम हो। तुमने तो साक्षात भगवान शिव के दर्शन किये है। उन्होंने ही अपनी योग-माया से तुम्हारे 6 महीने को एक रात में परिवर्तित कर दिया। काल-खंड को छोटा कर दिया। यह सब तुम्हारे पवित्र मन, तुम्हारी श्रद्वा और विश्वास के कारण ही हुआ है। हम आपकी भक्ति को प्रणाम करते है।
कहने का भाव यह है दोस्तो, अपनी भक्ति को कभी कम मत करना, आपके भगवान आप पर कृप्या कम नही करेगें।
जय भोले बाबा की।

शनिवार

मेरी आगे की यात्रा : एक अनुमान

जैसे-जैसे मैं अपने बुढ़ापे के द्वार की ओर यात्रा कर रहा हूँ, मैं उस रास्ते पर विचार करता हूं जिसमें मैं भाग रहा हूं। प्रत्येक कदम के साथ अर्जित ज्ञान व जागती स्मृतियाँ के साथ, मैं चिंतन और मनन करता हूँ।

जिस सड़क पर मैं चलता हूं, उसमें परीक्षणों और प्राप्त विजयों द्वारा चिह्नित तीव्र और हल्के मोड़ हैं। फिर भी, मेरे दिल में एक साहस है जो बुद्धि और अनुभव से ये सब पार कर जाता है।

मैं जो भी कदम उठाता हूँ, मेरे चेहरे पर एक शिकन सी आ जाती है, एक कहानी जो बहुत गहरी है, मेरे वर्षों की एक कहानी। मेरी ये पंक्तियाँ जीवन के हँसी, दुःख, प्यार और अनगिनत आँसुओं की जीवंत आलिंगन का प्रमाण हैं।

ये समय के प्रतीक बाल जो कभी मेरे युवावस्था को सुशोभित करते थे, अब धूमिल और कम हो रहे हैं।
लेकिन मेरे मन में अभी भी आग बरकरार है, एक मजबूत आत्मा, एक ज्वाला जो उत्कृष्ट रूप से जलती है।

हर गुजरते साल के साथ, मैं बुद्धिमान होता जाता हूँ,
जीवन जो सबक सिखाता है उसे अपनाता जा रहा हूँ।
शरीर धीरे-धीरे समझौता कर रहा है, पर आत्मा परमात्मा मिलन के लिए उतावला होता जा रहा हूँ।
तो अब, मुझे अपने बुढ़ापे के दरवाजे की थोड़ी यात्रा करने दो, मेरे संगी साथियों के साथ थोड़ी बातचीत करने दो। क्योंकि जैसे-जैसे मैं आगे की यात्रा करूँगा, उसे बताने के लिए मैं किसे खोजता रहूँगा?

*जिंदगी अटपटी निकली, तो सार भी अटपटा लिखा गया ;)

सोमवार

If I was a girl...☺️

If I was a girl, I would twirl
In a pretty dress, with my hair in a curl
I would paint my nails in shades of pink
And let my imagination run and think

I'd have a dollhouse, a tea set too
And pretty little shoes, all shiny and new
I'd bake cookies and cakes, with sprinkles and glaze
And go on picnics by the lake on summer days

I'd wear a crown, be a princess, a queen
And dance to my own rhythm, with a music machine
I'd be brave and bold, and never shy
And soar on wings, up into the sky

If I was a girl, the world would be my stage
And I'd fill it with joy, and love, and sage
For being a girl is a gift, that's true
And I'd cherish it, like nothing else I knew.

गुरुवार

why I meet with silence...

Amidst the chaos and all the noise,
I prefer to keep a low voice,
I stay silent, calm and still,
As I let my inner self fill.

I do not speak just for the sake,
And meaningless chatter I forsake,
My thoughts and actions align,
And peacefulness within me shines.

People may think I am aloof,
But I am not devoid of proof,
My silence is my greatest strength,
It helps me navigate great lengths.

In a world that is so loud,
Where everyone seeks to be proud,
I choose to stay introspective,
And find answers more reflective.

So let them judge, let them say,
I'm happy living this way,
In solitude, peace I find,
And leave all the chaos behind.

रविवार

time dilation theory in Hinduism: Learn in Hindi

रात्रि के अंतिम प्रहर में एक बुझी हुई चिता की भस्म पर अघोरी ने जैसे ही आसन लगाया, एक प्रेत ने उसकी गर्दन जकड़ ली और बोला- मैं जीवन भर विज्ञान का छात्र रहा और जीवन के उत्तरार्ध में तुम्हारे पुराणों की विचित्र कथाएं पढ़कर भ्रमित होता रहा। यदि तुम मुझे पौराणिक कथाओं की सार्थकता नहीं समझा सके तो मैं तुम्हे भी इसी भस्म में मिला दूंगा।
अघोरी बोला- एक कथा सुनो, रैवतक राजा की पुत्री का नाम रेवती था। वह सामान्य कद के पुरुषों से बहुत लंबी थी, राजा उसके विवाह योग्य वर खोजकर थक गये और चिंतित रहने लगे। थक-हारकर वो योगबल के द्वारा पुत्री को लेकर ब्रह्मलोक गए। राजा जब वहां पहुंचे तब गन्धर्वों का गायन समारोह चल रहा था, राजा ने गायन समाप्त होने की प्रतीक्षा की।

गायन समाप्ति के उपरांत ब्रह्मदेव ने राजा को देखा और पूछा- कहो, कैसे आना हुआ?

राजा ने कहा- मेरी पुत्री के लिए किसी वर को आपने बनाया अथवा नहीं?

ब्रह्मा जोर से हंसे और बोले- जब तुम आये तबतक तो नहीं, पर जिस कालावधि में तुमने यहाँ गन्धर्वगान सुना उतनी ही अवधि में पृथ्वी पर २७ चतुर्युग बीत चुके हैं और २८ वां द्वापर समाप्त होने वाला है, अब तुम वहां जाओ और कृष्ण के बड़े भाई बलराम से इसका विवाह कर दो, अच्छा हुआ की तुम रेवती को अपने साथ लाए जिससे इसकी आयु नहीं बढ़ी।

इस कथा का वैज्ञानिक संदर्भ समझो- आर्थर सी क्लार्क ने आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी की व्याख्या में एक पुस्तक लिखी है- मैन एंड स्पेस, उसमे गणना है की यदि 10 वर्ष का बालक यदि प्रकाश की गति वाले यान में बैठकर एंड्रोमेडा गैलेक्सी का एक चक्कर लगाये तो वापस आनेपर उसकी आयु ६६ वर्ष की होगी पर धरती पर 40 लाख वर्ष बीत चुके होंगे। यह आइंस्टीन की time dilation theory ही तो है जिसके लिए जॉर्ज गैमो ने एक मजाकिया कविता लिखी थी-

There was a young girl named Miss Bright,

Who could travel much faster than light

She departed one day in an Einstein way

And came back previous night

प्रेत यह सुनकर चकित था, बोला- यह कथा नहीं है, यह तो पौराणिक विज्ञान है, हमारी सभ्यता इतनी अद्भुत रही है, अविश्वसनीय है। तभी तो आइंस्टीन पुराणों को अपनी प्रेरणा कहते थे।

अघोरी मुस्कुराता रहा और प्रेत वायु में विलीन हो गया।

हम विश्व की सबसे उन्नत संस्कृति हैं यह विश्वास मत खोना।
🇮🇳

*यह 15 मंत्र जो...**हर हिंदू को सीखना और बच्चों को सिखाना चाहिए...

*

*_1. श्री गणेश जी (Shri Ganesh ji)_*
              वक्रतुंड महाकाय, 
              सूर्य कोटि समप्रभ 
              निर्विघ्नम कुरू मे देव,
              सर्वकार्येषु सर्वदा !!
*_2. श्री महादेव जी (Shri Mahadev ji)_*
          ॐ त्र्यम्बकं यजामहे, 
           सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ,
           उर्वारुकमिव बन्धनान्,
           मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् !!

*_3. श्री हरि विष्णु (Shri hari Vishnu)_*
           मङ्गलम् भगवान विष्णुः,
           मङ्गलम् गरुणध्वजः।
           मङ्गलम् पुण्डरी काक्षः,
           मङ्गलाय तनो हरिः॥

*_4. श्री ब्रह्मा जी (Shri Brahma ji)_*
             ॐ नमस्ते परमं ब्रह्मा,
              नमस्ते परमात्ने ।
              निर्गुणाय नमस्तुभ्यं,
              सदुयाय नमो नम:।।

*_5. श्री कृष्ण (Shri Krishn)_*
               वसुदेवसुतं देवं,
               कंसचाणूरमर्दनम्।
               देवकी परमानन्दं,
               कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम।

*_6. श्री राम (Shri Ram)_*
              श्री रामाय रामभद्राय,
               रामचन्द्राय वेधसे ।
               रघुनाथाय नाथाय,
               सीताया पतये नमः !

*_7. मां दुर्गा (Maa Durga)_*
            ॐ जयंती मंगला काली,
            भद्रकाली कपालिनी ।
            दुर्गा क्षमा शिवा धात्री,
            स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु‍ते।।

*_8. मां महालक्ष्मी (Maa Mahalakshmi)_*
            ॐ सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो,
            धन धान्यः सुतान्वितः ।
            मनुष्यो मत्प्रसादेन,
            भविष्यति न संशयःॐ ।

*_9. मां सरस्वती (Maa Saraswati)_*
            ॐ सरस्वति नमस्तुभ्यं,
             वरदे कामरूपिणि।
             विद्यारम्भं करिष्यामि,
             सिद्धिर्भवतु मे सदा ।।

*_10. मां महाकाली (Maa Mahakali)_*
             ॐ क्रीं क्रीं क्रीं,
             हलीं ह्रीं खं स्फोटय,
             क्रीं क्रीं क्रीं फट !!

*_11. श्री हनुमान जी (Shri Hanuman ji)_*
          मनोजवं मारुततुल्यवेगं,
          जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं।
          वातात्मजं वानरयूथमुख्यं,
          श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥

*_12. श्री शनिदेव जी (Shri Shanidev Ji)_*
             ॐ नीलांजनसमाभासं,
              रविपुत्रं यमाग्रजम ।
              छायामार्तण्डसम्भूतं, 
              तं नमामि शनैश्चरम् ||

*_13. श्री कार्तिकेय जी (Shri Kartikeya Ji)_*
        ॐ शारवाना-भावाया नम:,
         ज्ञानशक्तिधरा स्कंदा ,
         वल्लीईकल्याणा सुंदरा।
          देवसेना मन: कांता,
          कार्तिकेया नामोस्तुते ।

*_14. काल भैरव जी (Kaal Bhairav ji)_*
          ॐ ह्रीं वां बटुकाये,
          क्षौं क्षौं आपदुद्धाराणाये,
          कुरु कुरु बटुकाये,
          ह्रीं बटुकाये स्वाहा।

*_15. गायत्री मंत्र (Gayatri Mantra)_*
            ॐ भूर्भुवः स्वः,
            तत्सवितुर्वरेण्यम् 
            भर्गो देवस्य धीमहि 
            धियो यो नः प्रचोदयात् ॥


शनिवार

चिंता करने की आवश्यकता नहीं,

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एक दिन श्री कृष्ण और अर्जुन बातें करते हुए महल से दूर निकल गए।

मार्ग में उन्होंने एक गरीब ब्राह्मण को भिक्षा मांगते हुए देखा। अर्जुन को उस ब्राह्मण पर दया आ गयी, अतः उन्होंने उसे सोने के सिक्कों से भरी एक थैली देदी। ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुआ और वो सिक्के लेकर घर चल दिया।

जंगल के रास्ते में उसे एक चोर मिल गया, जिसने उसके सिक्के लूट लिए।

ब्राह्मण बहुत दुखी हुआ। मेरा भाग्य ही खराब है, यह कहता हुआ और भाग्य को कोसता हुआ ब्राह्मण पुनः भिक्षा मांगने आ गया। अगले दिन जब अर्जुन और कृष्ण उधर से गुजरे तो उन्होंने फिर से उस ब्राह्मण को भीख मांगते देखा।

वो उसके पास पहुंचे तो उन्हें चोरी की बात पता चली। अर्जुन ने फिर से उसपर दया करते हुए उसे एक बड़ा सा हीरा दे दिया।

ब्राह्मण घर पहुँचा. उसने हीरा एक पुराने घड़े में रख दिया जिसका प्रयोग नहीं होता था और सोने चला गया। अगले दिन ब्राह्मण के उठने के पहले उसकी पत्नी पानी भरने नदी की ओर गयी।

पानी भर के लाते समय उसके हाथ से घड़ा फिसल कर गिरा और टूट गया. ब्राह्मण की पत्नी को याद आया कि घर में एक पुराना घडा है जिसका प्रयोग नहीं होता। उसने सोचा क्यों न उसी में पानी भर लाया जाये।

वो घर आई, घड़ा उठाया और वापस पानी भरने चल दी। नदी में जब उसने घड़ा डुबाया तो हीरा घड़े से निकलकर पानी में बह गया।

जब वो घर आई तो उसने देखा ब्राह्मण पूरे घर में कुछ खोजता फिर रहा है। ब्राह्मण ने जब अपनी पत्नी के हाथ में उस घड़े को देखा और घड़े में सिर्फ पानी भरा देखा तो वह समझ गया क्या हुआ होगा।

हताश, निराश ब्राह्मण पुनः अगले दिन भीख मांगने उसी स्थान पर पहुँच गया। संयोग की बात, अर्जुन और कृष्ण कहीं से लौट रहे थे, उनका ध्यान फिर उसी ब्राह्मण की तरफ गया।

उत्सुकतावश वो उसके पास पहंचे और उससे पूछा कि अब आपको भीख मांगने की क्या आवश्यकता पड़ गयी। ब्राह्मण ने फिर अपनी रामकहानी सुनाई।

उसकी दुर्भाग्यपूर्ण कहानी सुनकर अर्जुन श्री कृष्ण से बोले – इस आदमी की किस्मत में सुख-समृद्धि लिखी ही नहीं हैं, मुझे नहीं लगता अब मैं और इसकी मदद कर पाउँगा।

श्री कृष्ण कुछ बोले नहीं, बस उन्होंने उस ब्राह्मण को दो पैसे दिए। ब्राह्मण ने वो पैसे लिए और घर चला गया।

ब्राह्मण के जाने के बाद अर्जुन बोले – जब मेरे इतना सोना, हीरा देने के बाद भी उसका भला नहीं हुआ तो आपके दिए 2 पैसे से उसका क्या भला होगा। श्री कृष्ण मुस्कुराये और बोले – देखते हैं क्या होता है !

ब्राह्मण अपने भाग्य को कोसता हुआ घर जा रहा था. रास्ते में उसने एक मछुआरे को देखा जोकि एक ताजी बड़ी मछली पकड़कर ले जा रहा था। मछली उसके जाल में तड़फड़ा रही थी और छूटने के लिए प्रयास कर रही थी।

ब्राह्मण को उस मछली की स्थिति देखकर दया आ गयी। उसने सोचा – इस 2 पैसे में मेरा क्या भला होगा, क्यों न इससे इस मछली के प्राण ही बचा लिए जाएँ।

ब्राह्मण ने वह मछली खरीद ली और उसे पुनः नदी में डालने चल पड़ा।

नदी में फेकने से पहले उसने देखा कि मछली के मुंह में कोई बड़ी वस्तु अटकी हुई थी जिसकी वजह से वो सांस नहीं ले पा रही थी। जब उसने मछली का मुंह खोलकर वह बाहर निकाला तो वही बड़ा हीरा निकला, जो उसे अर्जुन ने दिया था।

ब्राह्मण हीरा पाकर ख़ुशी से चिल्ला पड़ा – देखो देखो ! मिला गया मिला गया, आखिर मुझे मिल ही गया।

उससे थोड़ी ही दूर पर वही चोर जा रहा था, जिसने ब्राह्मण के सिक्के चुराए थे। उसने जब यह आवाज़ सुनी और ब्राह्मण को नदी की तरफ से आते हुए देखा तो चोर डर गया।

चोर ने उसे देखकर पहचान लिया था कि यह वही व्यक्ति है, जिसके सिक्के उसने चुराए थे। ब्राह्मण के चिल्लाने की आवाज सुनकर उसे लगा कि ब्राह्मण ने उसे पहचान लिया है और अब वो उसे पकड़वाकर सजा दिलवाएगा।

चोर ने ब्राह्मण के पैर पकड़ लिए और बोला – अरे भाई ! मुझे माफ़ कर दो, अपने सिक्के ले लो पर मुझे सजा मत दिलवाना, मुझसे बड़ी गलती हो गयी।

ब्राह्मण क्या बोलता पर वो सारा माजरा समझ गया। उसने चोर को माफ़ किया, अपने सिक्के लिए और ख़ुशी से मगन अपने घर चला गया।

अगले दिन ब्राह्मण सीधे अर्जुन के पास पहुंचा और उन्हें सारी बात बताई। ब्राह्मण ने अर्जुन को धन्यवाद दिया और चला गया।

उसके जाने के बाद अर्जुन श्री कृष्ण से बोले – हे प्रभु ! यह क्या चमत्कार है ? मेरे सिक्के और हीरे तो उसकी सहायता नहीं कर पाए पर आपके दिए दो पैसों ने कमाल कर दिया। इसका कारण जरा स्पष्ट करें।

श्री कृष्ण बोले – अर्जुन यह चमत्कार नहीं, सृष्टि का नियम है जिसपर दुनिया काम करती है। जब उसके पास ढेर सारे सिक्के और हीरे थे तो वह सिर्फ अपने बारे में, अपनी जरूरतों के बारे में ही सोच रहा था।

लेकिन जब उसके पास 2 पैसे थे तो भी उसने उस मछली के भले के लिए खर्च कर दिए। इसीलिए फिर उस ब्राह्मण के जरूरतों की जिम्मेदारी मैंने ले ली।

हे अर्जुन ! सत्य तो यह है कि जब तुम किसी दूसरे व्यक्ति के दुःख दर्द से द्रवित होते हो या अपने सिवा किसी और की जरूरतों की चिंता करते हो, उन लोगों के दुःख दूर करने और उनकी जरुरत पूरा करने का प्रयास करते हो, तो तुम भगवान के कार्य में हाथ बंटा रहे होते हो. फिर तुमको अपनी चिंता करने की आवश्यकता नहीं, तुम्हारी जरुरत भगवान खुद पूरी करेंगे।
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रविवार

ब्राह्मण के लिए सामान्य ज्ञान

​एक कुलीन ब्राह्मण को अपनी कुल परम्परा का सम्पूर्ण परिचय निम्न 11 (एकादश) बिन्दुओं के माध्यम से ज्ञात होना चाहिए -

1👉 गोत्र।

2👉 प्रवर।

3👉 वेद।

4👉 उपवेद।

5👉 शाखा।

6👉 सूत्र।

7👉 छन्द।

8👉 शिखा।

9👉 पाद।

10👉 देवता।

11👉 द्वार।
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1 गोत्र👉 गोत्र का अर्थ है कि वह कौन से ऋषिकुल का है या उसका जन्म किस ऋषिकुल से सम्बन्धित है । किसी व्यक्ति की वंश-परम्परा जहां से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता गया है। हम सभी जानते हें की हम किसी न किसी ऋषि की ही संतान है, इस प्रकार से जो जिस ऋषि से प्रारम्भ हुआ वह उस ऋषि का वंशज कहा गया । इन गोत्रों के मूल ऋषि – विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप- इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्त्य की संतान गोत्र कहलाती है। यानी जिस व्यक्ति का गौत्र भारद्वाज है, उसके पूर्वज ऋषि भारद्वाज थे और वह व्यक्ति इस ऋषि का वंशज है। इन गोत्रों के अनुसार इकाई को "गण" नाम दिया गया, यह माना गया की एक गण का व्यक्ति अपने गण में विवाह न कर अन्य गण में करेगा। इस प्रकार कालांतर में ब्राह्मणो की संख्या बढ़ते जाने पर पक्ष ओर शाखाये बनाई गई । इस तरह इन सप्त ऋषियों पश्चात उनकी संतानों के विद्वान ऋषियों के नामो से अन्य गोत्रों का नामकरण हुआ ।
गोत्र शब्द एक अर्थ में गो अर्थात् पृथ्वी का पर्याय भी है ओर 'त्र' का अर्थ रक्षा करने वाला भी हे। यहाँ गोत्र का अर्थ पृथ्वी की रक्षा करें वाले ऋषि से ही है। गो शब्द इन्द्रियों का वाचक भी है, ऋषि- मुनि अपनी इन्द्रियों को वश में कर अन्य प्रजाजनों का मार्ग दर्शन करते थे, इसलिए वे गोत्रकारक कहलाए। ऋषियों के गुरुकुल में जो शिष्य शिक्षा प्राप्त कर जहा कहीं भी जाते थे , वे अपने गुरु या आश्रम प्रमुख ऋषि का नाम बतलाते थे, जो बाद में उनके वंशधरो में स्वयं को उनके वही गोत्र कहने की परम्परा आविर्भूत हुई । जाति की तरह गोत्रों का भी अपना महत्‍व है , यथा -

1. गोत्रों से व्‍यक्ति और वंश की पहचान होती है ।

2. गोत्रों से व्‍यक्ति के सम्बन्धों की पहचान होती है ।

3. गोत्र से सम्बन्ध स्थापित करने में सुविधा रहती है ।

4. गोत्रों से निकटता स्‍थापित होती है और भाईचारा बढ़ता है ।

​5. गोत्रों के इतिहास से व्‍यक्ति गौरवान्वित महसूस करता है और प्रेरणा लेता है ।

2. प्रवर👉 प्रवर का अर्थ हे 'श्रेष्ठ" । अपनी कुल परम्परा के पूर्वजों एवं महान ऋषियों को प्रवर कहते हें । अपने कर्मो द्वारा ऋषिकुल में प्राप्‍त की गई श्रेष्‍ठता के अनुसार उन गोत्र प्रवर्तक मूल ऋषि के बाद होने वाले व्यक्ति, जो महान हो गए वे उस गोत्र के प्रवर कहलाते हें। इसका अर्थ है कि आपके कुल में आपके गोत्रप्रवर्त्तक मूल ऋषि के अनन्तर तीन अथवा पाँच आदि अन्य ऋषि भी विशेष महान हुए थे।

3. वेद👉 वेदों का साक्षात्कार ऋषियों ने लाभ किया है , इनको सुनकर याद किया जाता है , इन वेदों के उपदेशक गोत्रकार ऋषियों के जिस भाग का अध्ययन, अध्यापन, प्रचार प्रसार, आदि किया, उसकी रक्षा का भार उसकी संतान पर पड़ता गया इससे उनके पूर्व पुरूष जिस वेद ज्ञाता थे तदनुसार वेदाभ्‍यासी कहलाते हैं। प्रत्येक ब्राह्मण का अपना एक विशिष्ट वेद होता है , जिसे वह अध्ययन -अध्यापन करता है ।

4. उपवेद👉 प्रत्येक वेद से सम्बद्ध विशिष्ट उपवेद का भी ज्ञान होना चाहिये । 

5. शाखा👉 वेदो के विस्तार के साथ ऋषियों ने प्रत्येक एक गोत्र के लिए एक वेद के अध्ययन की परंपरा डाली है , कालान्तर में जब एक व्यक्ति उसके गोत्र के लिए निर्धारित वेद पढने में असमर्थ हो जाता था तो ऋषियों ने वैदिक परम्परा को जीवित रखने के लिए शाखाओं का निर्माण किया। इस प्रकार से प्रत्येक गोत्र के लिए अपने वेद की उस शाखा का पूर्ण अध्ययन करना आवश्यक कर दिया। इस प्रकार से उन्‍होने जिसका अध्‍ययन किया, वह उस वेद की शाखा के नाम से पहचाना गया।

6. सूत्र👉 व्यक्ति शाखा के अध्ययन में असमर्थ न हो , अतः उस गोत्र के परवर्ती ऋषियों ने उन शाखाओं को सूत्र रूप में विभाजित किया है, जिसके माध्यम से उस शाखा में प्रवाहमान ज्ञान व संस्कृति को कोई क्षति न हो और कुल के लोग संस्कारी हों !

7. छन्द👉 उक्तानुसार ही प्रत्येक ब्राह्मण को अपने परम्परासम्मत छन्द का भी ज्ञान होना चाहिए ।

8. शिखा👉 अपनी कुल परम्परा के अनुरूप शिखा को दक्षिणावर्त अथवा वामावार्त्त रूप से बांधने की परम्परा शिखा कहलाती है ।

9. पाद👉 अपने-अपने गोत्रानुसार लोग अपना पाद प्रक्षालन करते हैं । ये भी अपनी एक पहचान बनाने के लिए ही, बनाया गया एक नियम है । अपने -अपने गोत्र के अनुसार ब्राह्मण लोग पहले अपना बायाँ पैर धोते, तो किसी गोत्र के लोग पहले अपना दायाँ पैर धोते, इसे ही पाद कहते हैं ।

10. देवता👉 प्रत्येक वेद या शाखा का पठन, पाठन करने वाले किसी विशेष देव की आराधना करते है वही उनका कुल देवता [गणेश , विष्णु, शिव , दुर्गा ,सूर्य इत्यादि पञ्च देवों में से कोई एक ] उनके आराध्‍य देव है । इसी प्रकार कुल के भी संरक्षक देवता या कुलदेवी होती हें । इनका ज्ञान कुल के वयोवृद्ध अग्रजों [माता-पिता आदि ] के द्वारा अगली पीड़ी को दिया जाता है । एक कुलीन ब्राह्मण को अपने तीनों प्रकार के देवताओं का बोध तो अवश्य ही होना चाहिए -

(क) इष्ट देवता अथवा इष्ट देवी ।
(ख) कुल देवता अथवा कुल देवी ।
(ग) ग्राम देवता अथवा ग्राम देवी ।

11. द्वार👉 यज्ञ मण्डप में अध्वर्यु (यज्ञकर्त्ता ) जिस दिशा अथवा द्वार से प्रवेश करता है अथवा जिस दिशा में बैठता है

शनिवार

bada

कलम: एक खयाल: बड़ा सदियों पहले कबीरदास का कहा दोहा आज सुबह से मेरे मस्तिष्क में घूम रहा था तो सोचा कि इसे ही लेखन का विषय क्यों न बनाया जाय।  कबीर का व...

बुधवार

बॉम्बे हाई : मेरा यात्रा वृतांत

बोम्बे हाई नाम से कुछ समझ नहीं आता कुछ अटपटा सा लगता है | फिर भी जो लोग थोडा-बहुत ज्ञान रखते  है उनको पता होगा ही की बोम्बे हाई से तेल व् गैस निकलती है जो समुन्द्र में भारत से कोसो दूर है| कुछ दिन पहले मुझे यहाँ आने का सोभाग्य (पता नहीं सौभाग्य या दुर्भाग्य) प्राप्त हुआ | यहाँ काफी प्लेटफोर्म बने हैं जो गैस व् तेल निकालने और निथारने का काम करते हैं| यहाँ पर मुख्यत: ONGC के लोग काम करते हैं ,कहा जाये की राज करते हैं | इसके अतिरिक्त लगभग इनसे दुगने लोग यहाँ CONTRACT के रूप में काम करते हैं| चलो जैसा भी यहाँ अच्छा काम चल रहा है हर कोई अपने काम में लीन रहता है|
जब मुंबई छोड क्रर हैलिकोपटर में बैठा तब लग रहा था की पीछे काफी कुछ छोड कर जा रहा हूँ | पर खुशी यह भी थी की नई जगह नए लोग मिलेंगे .नई बातों का पता चलेगा वगरह-२ | उड़न खटोले से आनंद लेते हुये पता ही नहीं चला की एक घंटा कब बीत गया | उपर निचे, दायें-बायं घूमते हुए, इतनी घनी  मुंबई को इतना छोटा देखते हुये मैं भूल चूका था की मैं यहाँ क्यों और कहाँ से आया हूँ | मैं बस खो गया था | हालाँकि यह मेरी पहली हवाई यात्रा नहीं थी किन्तु एक शीशे से बने गुब्बारे में मैं पहली बार उड़ रहा था |
मंजिल आ गई | मैंने उतर क्रर देखा की चारों तरफ नमकीन पानी ही पानी था और मैं खड़ा हूँ एक पाइपों के ढांचे पर | बड़े -२ पाइप समुन्द्र की छाती चिरते हुये मानो आर-पार निकल गए हों | मानवीय क्रला के इस अद्भुत संगम ने एक ऐसा रूप ले रखा था जिस पर हजारों कर्मियों के हजारों नित्यकर्म होते थे | इन्ही पाइपों की जोड़ घटा पर फडफडा क्र उड़ने वाला रोबोट आ-जा सकता था | यहाँ पर हर वस्तु उच्च दक्षता को बयाँ कर रही थी |
उस समुन्द्र की एवरेस्ट से हम धीरे-२ नीचे उतरने लगे | वहाँ सब कुछ ध्यान से करने का था थोडा ध्यान हटा तो जय राम जी की | सीढियों से नीचे उतर कर  २-३ लाल रंग के दरवाजों में से एक में घुसे तो वहाँ रहने के छोटे किन्तु अच्छे कमरे थे | धीरे-२ हम आगे बढते रहे तो इनकी रोनाक भी कम होने लगी | आख़िरकार एक स्टोर जैसे दिखने वाले कमरे को हमारे रहने का उपयुक्त स्थान बताया गया | इनमे ४ से ६ आदमी रहते थे एक फोन, एक कुर्सी , एक मेज, दो अल्मारी और बाकि ४-५ पानी से भरी कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलें | घुसते ही उपस्थित लोगों ने स्वागतम् की भीनी भीनी मुस्कान छोड़ी | मैंने सोचा चलो कोई बात नहीं साथ में रहने वाले लोग तो अच्छे हैं | इनके साथ कमरे का नक्सा भूल जाऊंगा | पर ये क्या ? पांच मिनट में सब उमीदों पर पानी फिर गया | सभी के सभी मलयाली बोलने वाले | इशारों-२ में टूटी-फूटी अंग्रेजी से पता चला की इस बिग बॉस के घर में तो बिना लिपस्टिक वाली मुस्कान से ही काम चलाना पडेगा | (NO HINDI ,NO ENGLISH) | शायद २०-२५ दिनों में मुझे भी एस कूड-कूड का ज्ञान हो जाय  या फिर सिर्फ मैं अपने शुरुवाती पूर्वजों की भाषा (इशारे की भाषा) ही याद रख पाउंगा |
परन्तु ये दिन मेरे जीवन के शायद सबसे शांति भरे दिन थे | अधिकतर मैं अकेला ही रहता था | मेरे पास कुछ न करने के लिए बहुत समय था | मैं अपना एकांत टेलीफोन से समाप्त कर सकता था पर मुंबई से सौ योजन दूर सभी की "पहुंचे हर जगह " वाली फिलोश्पी फीकी पड जाती थी | यहाँ सिर्फ एक ही फोन है ,जिससे आप अपने शुभचिंतको को दिलासा दे सकते हैं | समुन्द्र की इतनी गहराई में होने बाद भी यहाँ किसी चीज की कोइ कमी नहीं थी | खाने के लिए सभी चीजे जो भी चाहें सभी चीजें मिल सकती थी ,परन्तु पीने के लिए यहाँ कोल्ड ड्रिंक्स व् जूस ही मिलते थे | मदिरा सेवन यहाँ पूर्णतया प्रतिबद्ध था | सब कुछ मिलाकर देखे तो यहाँ मन को संत्वना देने के लिए हर चीज का प्रबंध किया गया था |
इन २०-२५ दिनों में हालाँकि मै कूड-कूड नहीं सीख पाया हूँ परन्तु उसका भावनात्मक अर्थ मैं समझने लगा हूँ | मैं सोचता हूँ जब आदमी अपनी जगह बदलने वाला हो तो उसे उसके पीछे साथियों को उसकी कमियों के बारे में अवगत करा देना चाहिए हालाँकि अधिकतर आपके विचार इसके विपरीत होंगे | परन्तु जाते समय यदि उसकी बुराई की जाय तो शायद वे अगले पडाव पर अच्छा बनने या गलतियों को न सुधारने की कोशिश करे या जब आप उन्हें छोड रहे हो तो भी वही formula लागु होता है |
मैं इन लोहे और पाइपों पर बने इस अद्भुत सदन के मालिकों से कहना चाहूँगा की मेहरबानी करके अपने स्वभाव को थोडा बदले | मानता हूँ कोंट्रेक्टर लोगों के पास job security नामक वस्तु का अभाव है प्रर इसका यह आशय तो नहीं की उनकी मानव श्रेणी में गणना न हो | पाखाने से खाने तक का उनका नजरिया अलग बनाया हुआ है | कुछ को तो सर पर छत भी नसीब नहीं है | वो बेचारे फटे कम्बल में लोहे की मशीनो के ढाचे के बीच में पड़े रहते है | उनकी कोई सुध नहीं ले रहा | जो भी है मेरा यही कहना है की हो सके तो इन मानवों से मानवता का व्यवहार शुरू कीजिए | वो भी आपके ही हिंदुस्तान के भाई बहिन हैं |
अभी मेरा यहाँ से जाने का समय हो चुका है | इन दिनों में आत्म चिंतन का मैंने बहुत महत्वपूरण व अद्भुत अध्याय पढा है | यही सब कुछ है जो मैंने इन दिनों में प्राप्त किया है | आशा करता हूँ की मेरी उँगलियों में हुए दर्द की आप कद्र करेंगे और थोडा सा मानवता का व्यवहार करेंगे |
ok............then c u in mumbai    

सोमवार

मेरे घर का बोलता पुस्तकालय...

किताबे.. किताबे ..किताबे और किताबे
हर  जगह बस किताबे हे दिखाई दे रही है | बिस्तर पर, अलमारी में, मेज पर, दराज में और तो और सूटकेस व बॉक्स में भी | कितना अच्छा लगता है जब चारों तरफ किताबे ही किताबे हो | वो भी अच्छी व सुरक्षित स्थिती में  | किताबे भी खुश, देखने वाले भी खुश  और पढ़ने वाले ......ओह क्षमा किजीये वो तो है ही नहीं ....

मैं किसी और  की बात नहीं कर रहा हूँ इतना निखोता कौन हो सकता है  ? मैं मेरी और मेरी किताबो की बात कर रहा हू | ऐसी कोई पढाई की लाइन नहीं है जिसकी मेरे पास किताब न हो | और ऐसी कोई पढाई की लाइन नहीं है हो मैने ढंग से पढ़ी हो | मुझे किताबे खरीदने का बस शोक ही है पढ़ने का नही | पता नहीं क्यों ? आज तक मुझे ही समझ नहीं आया | मेरे पास बहुत सी किताबे है पर शायद ही कोई उनमें से पूरी पढ़ी हो , बस २-३ पेज बस , फिर आखें बंद और  निद्रा शुरू |

एक कदर मेरे मन में ख्याल आया की कैसा होता यदि ये सभी किताबे आदमी-ओरतें होती ? सभी किताबे आपस में बात करती, मुझ से बात करती, उनकी बात मुझे सुनाती और मेरी बातें वो भी सुनती , मुझ से उनमें लिखी बातों पर वाद विवाद करती , कभी मैं हारता कभी वो हारते ...वाह कितना मजा आता | न कभी अकेलापन मह्सुश होता और न ही कभी बोर हो कर नींद आती | कभी घर पहुचता तो कोई किताब अच्छा सा गीत या गीतांजली सुनाती | खाना बनाने के लिए कोई व्यंजन की विधीयां बताती तो कोई शेरो शायरी करती | रात को माँ की लोरियाँ माँ की डायरी से सुनाती ......
अरे यार | माँ की डायरी से माँ की याद आ गयी | चलता हू फिर मिलेगे इन बोलती किताबों के लिए .........

रविवार

राघव की दुनिया में एंट्री

मम्मी पापा को देखते हुए राघव धीरे धीरे बड़ा हो रहा था | उसकी दुनिया उसके मकान, उसकी लिफ्ट और सामने वाले बगीचे में लगे कुछ झूलों तक ही सीमीत थी | वो न किसी गॅाव को जानता था न ही उसमें रहने वाले उसके दादी-दादा, ताऊ-ताई, चाचा- चाची या भाई बहिन को | वो जानता था तो बस उस भीड़ भरी मुंबई के उस छोटे से बगीचे में खेलने वाले छोटे छोटे बच्चों को | शायद उसे तो पता ही नहीं होगा की इस दुनिया से बहार भी कोई दुनिया है |
जब राघव की मम्मी उसके पापा के साथ रहने आई तब वह बड़ी खुश थी कि चलो गॉव की दिक्कतों व प्राणियों से छुटकारा तो मिला | और पता नहीं क्या क्या सोच कर अपने पति के साथ मुंबई में ४×६ के मकान में रहने लगी | समय के साथ साथ राघव की मम्मी को जीवन नीरस लगने लगा क्यों कि करने को तो कुछ था ही नही | उस ४×६ के कमरे के सफाई की और फिर क्या? जो वह करना चाहती थी वह वहाँ था नहीं और जो था वो वह करना नहीं चाहती थी |
चलो जो भी था धीरे धीरे एक दिन राघव की उपस्थिति का पता चला | पापा मम्मी बड़े उतावले हो गए कि कब बाहर निकलेगा? कैसे क्या कब होगा आदि आदि | बस अभी तो सब झिलमिल लग रहा था | जब वो ultrasound  करवाने गए तो दोनों बड़े कुछ थे कि आज कम से कम टेलिविज़न में तो देखेगे | डॉ साह्ब की मेहरबानी से पापा अंदर तो चले तो गए पर सौस रोक कर बनाई गयी उनकी mobmovie की कोशिश नाकाम रही |
रही सही कसर डॉ साहब में यह कह कर निकल दी कि एक और ultrasound होगा | कारण पूछा तो बोले की कुछ नहीं बस थोडा संदेह है थोड़े दिन बाद थोडा ठीक हो जायेगा तब ठीक से देखना है कि बच्चा तंदुरुस्त है या नहीं |मन में नाना प्रकार की शंकयो के साथ मम्मी पापा अगली बार आने का appointment ले कर बार बाहर निकल गए |