मौसम मन का अनुवाद है
प्रकृति में बसंत
और मन में पतझर हो
तो खिले फूल भी खिले नहीं होते
ये मौसम के लिए मन का
प्रतिवाद है।
खिलने की ऋतु भी
मुरझाई रहती
उमंग की धरा
अलसाई रहती
लौटती धारा सा
विपरीत दिशा में चलन
ये मन का विसंवाद है।
कोयल बोले तो
मन में पुलक भरे
मयूर नाचे तो
मन नृत्य करे
झरनों के संग मन करे
मन की ऋतु के अनुकूल ही
मौसम मन का अनुवाद है।
भक्ति, शक्ति और हिंदुत्व के साथ जो जिंदगी की यात्रा मैने जी है और जिस प्रकार जीने का अनुमान है, उस भूत और भविष्य को लेखनी के माध्यम से संवादित करने की चेष्ठा करूंगा। सामान्यता हर जीव की यात्रा में सुख दुःख धूप छांव की तरह आते रहते हैं, परंतु इस यात्रा की इस धूप छांव को अपने सहयात्रियों से साझा करने पर इसे मज़ेदार और प्रसन्नचित बनाया जा सकता है। इसलिए आइए, मैं अपने विचार रखता हूं, आप अपने विचार व्यक्त कीजिए।
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