रविवार

*यह 15 मंत्र जो...**हर हिंदू को सीखना और बच्चों को सिखाना चाहिए...

*

*_1. श्री गणेश जी (Shri Ganesh ji)_*
              वक्रतुंड महाकाय, 
              सूर्य कोटि समप्रभ 
              निर्विघ्नम कुरू मे देव,
              सर्वकार्येषु सर्वदा !!
*_2. श्री महादेव जी (Shri Mahadev ji)_*
          ॐ त्र्यम्बकं यजामहे, 
           सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ,
           उर्वारुकमिव बन्धनान्,
           मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् !!

*_3. श्री हरि विष्णु (Shri hari Vishnu)_*
           मङ्गलम् भगवान विष्णुः,
           मङ्गलम् गरुणध्वजः।
           मङ्गलम् पुण्डरी काक्षः,
           मङ्गलाय तनो हरिः॥

*_4. श्री ब्रह्मा जी (Shri Brahma ji)_*
             ॐ नमस्ते परमं ब्रह्मा,
              नमस्ते परमात्ने ।
              निर्गुणाय नमस्तुभ्यं,
              सदुयाय नमो नम:।।

*_5. श्री कृष्ण (Shri Krishn)_*
               वसुदेवसुतं देवं,
               कंसचाणूरमर्दनम्।
               देवकी परमानन्दं,
               कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम।

*_6. श्री राम (Shri Ram)_*
              श्री रामाय रामभद्राय,
               रामचन्द्राय वेधसे ।
               रघुनाथाय नाथाय,
               सीताया पतये नमः !

*_7. मां दुर्गा (Maa Durga)_*
            ॐ जयंती मंगला काली,
            भद्रकाली कपालिनी ।
            दुर्गा क्षमा शिवा धात्री,
            स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु‍ते।।

*_8. मां महालक्ष्मी (Maa Mahalakshmi)_*
            ॐ सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो,
            धन धान्यः सुतान्वितः ।
            मनुष्यो मत्प्रसादेन,
            भविष्यति न संशयःॐ ।

*_9. मां सरस्वती (Maa Saraswati)_*
            ॐ सरस्वति नमस्तुभ्यं,
             वरदे कामरूपिणि।
             विद्यारम्भं करिष्यामि,
             सिद्धिर्भवतु मे सदा ।।

*_10. मां महाकाली (Maa Mahakali)_*
             ॐ क्रीं क्रीं क्रीं,
             हलीं ह्रीं खं स्फोटय,
             क्रीं क्रीं क्रीं फट !!

*_11. श्री हनुमान जी (Shri Hanuman ji)_*
          मनोजवं मारुततुल्यवेगं,
          जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं।
          वातात्मजं वानरयूथमुख्यं,
          श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥

*_12. श्री शनिदेव जी (Shri Shanidev Ji)_*
             ॐ नीलांजनसमाभासं,
              रविपुत्रं यमाग्रजम ।
              छायामार्तण्डसम्भूतं, 
              तं नमामि शनैश्चरम् ||

*_13. श्री कार्तिकेय जी (Shri Kartikeya Ji)_*
        ॐ शारवाना-भावाया नम:,
         ज्ञानशक्तिधरा स्कंदा ,
         वल्लीईकल्याणा सुंदरा।
          देवसेना मन: कांता,
          कार्तिकेया नामोस्तुते ।

*_14. काल भैरव जी (Kaal Bhairav ji)_*
          ॐ ह्रीं वां बटुकाये,
          क्षौं क्षौं आपदुद्धाराणाये,
          कुरु कुरु बटुकाये,
          ह्रीं बटुकाये स्वाहा।

*_15. गायत्री मंत्र (Gayatri Mantra)_*
            ॐ भूर्भुवः स्वः,
            तत्सवितुर्वरेण्यम् 
            भर्गो देवस्य धीमहि 
            धियो यो नः प्रचोदयात् ॥


शनिवार

चिंता करने की आवश्यकता नहीं,

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एक दिन श्री कृष्ण और अर्जुन बातें करते हुए महल से दूर निकल गए।

मार्ग में उन्होंने एक गरीब ब्राह्मण को भिक्षा मांगते हुए देखा। अर्जुन को उस ब्राह्मण पर दया आ गयी, अतः उन्होंने उसे सोने के सिक्कों से भरी एक थैली देदी। ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुआ और वो सिक्के लेकर घर चल दिया।

जंगल के रास्ते में उसे एक चोर मिल गया, जिसने उसके सिक्के लूट लिए।

ब्राह्मण बहुत दुखी हुआ। मेरा भाग्य ही खराब है, यह कहता हुआ और भाग्य को कोसता हुआ ब्राह्मण पुनः भिक्षा मांगने आ गया। अगले दिन जब अर्जुन और कृष्ण उधर से गुजरे तो उन्होंने फिर से उस ब्राह्मण को भीख मांगते देखा।

वो उसके पास पहुंचे तो उन्हें चोरी की बात पता चली। अर्जुन ने फिर से उसपर दया करते हुए उसे एक बड़ा सा हीरा दे दिया।

ब्राह्मण घर पहुँचा. उसने हीरा एक पुराने घड़े में रख दिया जिसका प्रयोग नहीं होता था और सोने चला गया। अगले दिन ब्राह्मण के उठने के पहले उसकी पत्नी पानी भरने नदी की ओर गयी।

पानी भर के लाते समय उसके हाथ से घड़ा फिसल कर गिरा और टूट गया. ब्राह्मण की पत्नी को याद आया कि घर में एक पुराना घडा है जिसका प्रयोग नहीं होता। उसने सोचा क्यों न उसी में पानी भर लाया जाये।

वो घर आई, घड़ा उठाया और वापस पानी भरने चल दी। नदी में जब उसने घड़ा डुबाया तो हीरा घड़े से निकलकर पानी में बह गया।

जब वो घर आई तो उसने देखा ब्राह्मण पूरे घर में कुछ खोजता फिर रहा है। ब्राह्मण ने जब अपनी पत्नी के हाथ में उस घड़े को देखा और घड़े में सिर्फ पानी भरा देखा तो वह समझ गया क्या हुआ होगा।

हताश, निराश ब्राह्मण पुनः अगले दिन भीख मांगने उसी स्थान पर पहुँच गया। संयोग की बात, अर्जुन और कृष्ण कहीं से लौट रहे थे, उनका ध्यान फिर उसी ब्राह्मण की तरफ गया।

उत्सुकतावश वो उसके पास पहंचे और उससे पूछा कि अब आपको भीख मांगने की क्या आवश्यकता पड़ गयी। ब्राह्मण ने फिर अपनी रामकहानी सुनाई।

उसकी दुर्भाग्यपूर्ण कहानी सुनकर अर्जुन श्री कृष्ण से बोले – इस आदमी की किस्मत में सुख-समृद्धि लिखी ही नहीं हैं, मुझे नहीं लगता अब मैं और इसकी मदद कर पाउँगा।

श्री कृष्ण कुछ बोले नहीं, बस उन्होंने उस ब्राह्मण को दो पैसे दिए। ब्राह्मण ने वो पैसे लिए और घर चला गया।

ब्राह्मण के जाने के बाद अर्जुन बोले – जब मेरे इतना सोना, हीरा देने के बाद भी उसका भला नहीं हुआ तो आपके दिए 2 पैसे से उसका क्या भला होगा। श्री कृष्ण मुस्कुराये और बोले – देखते हैं क्या होता है !

ब्राह्मण अपने भाग्य को कोसता हुआ घर जा रहा था. रास्ते में उसने एक मछुआरे को देखा जोकि एक ताजी बड़ी मछली पकड़कर ले जा रहा था। मछली उसके जाल में तड़फड़ा रही थी और छूटने के लिए प्रयास कर रही थी।

ब्राह्मण को उस मछली की स्थिति देखकर दया आ गयी। उसने सोचा – इस 2 पैसे में मेरा क्या भला होगा, क्यों न इससे इस मछली के प्राण ही बचा लिए जाएँ।

ब्राह्मण ने वह मछली खरीद ली और उसे पुनः नदी में डालने चल पड़ा।

नदी में फेकने से पहले उसने देखा कि मछली के मुंह में कोई बड़ी वस्तु अटकी हुई थी जिसकी वजह से वो सांस नहीं ले पा रही थी। जब उसने मछली का मुंह खोलकर वह बाहर निकाला तो वही बड़ा हीरा निकला, जो उसे अर्जुन ने दिया था।

ब्राह्मण हीरा पाकर ख़ुशी से चिल्ला पड़ा – देखो देखो ! मिला गया मिला गया, आखिर मुझे मिल ही गया।

उससे थोड़ी ही दूर पर वही चोर जा रहा था, जिसने ब्राह्मण के सिक्के चुराए थे। उसने जब यह आवाज़ सुनी और ब्राह्मण को नदी की तरफ से आते हुए देखा तो चोर डर गया।

चोर ने उसे देखकर पहचान लिया था कि यह वही व्यक्ति है, जिसके सिक्के उसने चुराए थे। ब्राह्मण के चिल्लाने की आवाज सुनकर उसे लगा कि ब्राह्मण ने उसे पहचान लिया है और अब वो उसे पकड़वाकर सजा दिलवाएगा।

चोर ने ब्राह्मण के पैर पकड़ लिए और बोला – अरे भाई ! मुझे माफ़ कर दो, अपने सिक्के ले लो पर मुझे सजा मत दिलवाना, मुझसे बड़ी गलती हो गयी।

ब्राह्मण क्या बोलता पर वो सारा माजरा समझ गया। उसने चोर को माफ़ किया, अपने सिक्के लिए और ख़ुशी से मगन अपने घर चला गया।

अगले दिन ब्राह्मण सीधे अर्जुन के पास पहुंचा और उन्हें सारी बात बताई। ब्राह्मण ने अर्जुन को धन्यवाद दिया और चला गया।

उसके जाने के बाद अर्जुन श्री कृष्ण से बोले – हे प्रभु ! यह क्या चमत्कार है ? मेरे सिक्के और हीरे तो उसकी सहायता नहीं कर पाए पर आपके दिए दो पैसों ने कमाल कर दिया। इसका कारण जरा स्पष्ट करें।

श्री कृष्ण बोले – अर्जुन यह चमत्कार नहीं, सृष्टि का नियम है जिसपर दुनिया काम करती है। जब उसके पास ढेर सारे सिक्के और हीरे थे तो वह सिर्फ अपने बारे में, अपनी जरूरतों के बारे में ही सोच रहा था।

लेकिन जब उसके पास 2 पैसे थे तो भी उसने उस मछली के भले के लिए खर्च कर दिए। इसीलिए फिर उस ब्राह्मण के जरूरतों की जिम्मेदारी मैंने ले ली।

हे अर्जुन ! सत्य तो यह है कि जब तुम किसी दूसरे व्यक्ति के दुःख दर्द से द्रवित होते हो या अपने सिवा किसी और की जरूरतों की चिंता करते हो, उन लोगों के दुःख दूर करने और उनकी जरुरत पूरा करने का प्रयास करते हो, तो तुम भगवान के कार्य में हाथ बंटा रहे होते हो. फिर तुमको अपनी चिंता करने की आवश्यकता नहीं, तुम्हारी जरुरत भगवान खुद पूरी करेंगे।
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रविवार

ब्राह्मण के लिए सामान्य ज्ञान

​एक कुलीन ब्राह्मण को अपनी कुल परम्परा का सम्पूर्ण परिचय निम्न 11 (एकादश) बिन्दुओं के माध्यम से ज्ञात होना चाहिए -

1👉 गोत्र।

2👉 प्रवर।

3👉 वेद।

4👉 उपवेद।

5👉 शाखा।

6👉 सूत्र।

7👉 छन्द।

8👉 शिखा।

9👉 पाद।

10👉 देवता।

11👉 द्वार।

1 गोत्र👉 गोत्र का अर्थ है कि वह कौन से ऋषिकुल का है या उसका जन्म किस ऋषिकुल से सम्बन्धित है । किसी व्यक्ति की वंश-परम्परा जहां से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता गया है। हम सभी जानते हें की हम किसी न किसी ऋषि की ही संतान है, इस प्रकार से जो जिस ऋषि से प्रारम्भ हुआ वह उस ऋषि का वंशज कहा गया । इन गोत्रों के मूल ऋषि – विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप- इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्त्य की संतान गोत्र कहलाती है। यानी जिस व्यक्ति का गौत्र भारद्वाज है, उसके पूर्वज ऋषि भारद्वाज थे और वह व्यक्ति इस ऋषि का वंशज है। इन गोत्रों के अनुसार इकाई को "गण" नाम दिया गया, यह माना गया की एक गण का व्यक्ति अपने गण में विवाह न कर अन्य गण में करेगा। इस प्रकार कालांतर में ब्राह्मणो की संख्या बढ़ते जाने पर पक्ष ओर शाखाये बनाई गई । इस तरह इन सप्त ऋषियों पश्चात उनकी संतानों के विद्वान ऋषियों के नामो से अन्य गोत्रों का नामकरण हुआ ।
गोत्र शब्द एक अर्थ में गो अर्थात् पृथ्वी का पर्याय भी है ओर 'त्र' का अर्थ रक्षा करने वाला भी हे। यहाँ गोत्र का अर्थ पृथ्वी की रक्षा करें वाले ऋषि से ही है। गो शब्द इन्द्रियों का वाचक भी है, ऋषि- मुनि अपनी इन्द्रियों को वश में कर अन्य प्रजाजनों का मार्ग दर्शन करते थे, इसलिए वे गोत्रकारक कहलाए। ऋषियों के गुरुकुल में जो शिष्य शिक्षा प्राप्त कर जहा कहीं भी जाते थे , वे अपने गुरु या आश्रम प्रमुख ऋषि का नाम बतलाते थे, जो बाद में उनके वंशधरो में स्वयं को उनके वही गोत्र कहने की परम्परा आविर्भूत हुई । जाति की तरह गोत्रों का भी अपना महत्‍व है , यथा -

1. गोत्रों से व्‍यक्ति और वंश की पहचान होती है ।

2. गोत्रों से व्‍यक्ति के सम्बन्धों की पहचान होती है ।

3. गोत्र से सम्बन्ध स्थापित करने में सुविधा रहती है ।

4. गोत्रों से निकटता स्‍थापित होती है और भाईचारा बढ़ता है ।

​5. गोत्रों के इतिहास से व्‍यक्ति गौरवान्वित महसूस करता है और प्रेरणा लेता है ।

2. प्रवर👉 प्रवर का अर्थ हे 'श्रेष्ठ" । अपनी कुल परम्परा के पूर्वजों एवं महान ऋषियों को प्रवर कहते हें । अपने कर्मो द्वारा ऋषिकुल में प्राप्‍त की गई श्रेष्‍ठता के अनुसार उन गोत्र प्रवर्तक मूल ऋषि के बाद होने वाले व्यक्ति, जो महान हो गए वे उस गोत्र के प्रवर कहलाते हें। इसका अर्थ है कि आपके कुल में आपके गोत्रप्रवर्त्तक मूल ऋषि के अनन्तर तीन अथवा पाँच आदि अन्य ऋषि भी विशेष महान हुए थे।

3. वेद👉 वेदों का साक्षात्कार ऋषियों ने लाभ किया है , इनको सुनकर याद किया जाता है , इन वेदों के उपदेशक गोत्रकार ऋषियों के जिस भाग का अध्ययन, अध्यापन, प्रचार प्रसार, आदि किया, उसकी रक्षा का भार उसकी संतान पर पड़ता गया इससे उनके पूर्व पुरूष जिस वेद ज्ञाता थे तदनुसार वेदाभ्‍यासी कहलाते हैं। प्रत्येक ब्राह्मण का अपना एक विशिष्ट वेद होता है , जिसे वह अध्ययन -अध्यापन करता है ।

4. उपवेद👉 प्रत्येक वेद से सम्बद्ध विशिष्ट उपवेद का भी ज्ञान होना चाहिये । 

5. शाखा👉 वेदो के विस्तार के साथ ऋषियों ने प्रत्येक एक गोत्र के लिए एक वेद के अध्ययन की परंपरा डाली है , कालान्तर में जब एक व्यक्ति उसके गोत्र के लिए निर्धारित वेद पढने में असमर्थ हो जाता था तो ऋषियों ने वैदिक परम्परा को जीवित रखने के लिए शाखाओं का निर्माण किया। इस प्रकार से प्रत्येक गोत्र के लिए अपने वेद की उस शाखा का पूर्ण अध्ययन करना आवश्यक कर दिया। इस प्रकार से उन्‍होने जिसका अध्‍ययन किया, वह उस वेद की शाखा के नाम से पहचाना गया।

6. सूत्र👉 व्यक्ति शाखा के अध्ययन में असमर्थ न हो , अतः उस गोत्र के परवर्ती ऋषियों ने उन शाखाओं को सूत्र रूप में विभाजित किया है, जिसके माध्यम से उस शाखा में प्रवाहमान ज्ञान व संस्कृति को कोई क्षति न हो और कुल के लोग संस्कारी हों !

7. छन्द👉 उक्तानुसार ही प्रत्येक ब्राह्मण को अपने परम्परासम्मत छन्द का भी ज्ञान होना चाहिए ।

8. शिखा👉 अपनी कुल परम्परा के अनुरूप शिखा को दक्षिणावर्त अथवा वामावार्त्त रूप से बांधने की परम्परा शिखा कहलाती है ।

9. पाद👉 अपने-अपने गोत्रानुसार लोग अपना पाद प्रक्षालन करते हैं । ये भी अपनी एक पहचान बनाने के लिए ही, बनाया गया एक नियम है । अपने -अपने गोत्र के अनुसार ब्राह्मण लोग पहले अपना बायाँ पैर धोते, तो किसी गोत्र के लोग पहले अपना दायाँ पैर धोते, इसे ही पाद कहते हैं ।

10. देवता👉 प्रत्येक वेद या शाखा का पठन, पाठन करने वाले किसी विशेष देव की आराधना करते है वही उनका कुल देवता [गणेश , विष्णु, शिव , दुर्गा ,सूर्य इत्यादि पञ्च देवों में से कोई एक ] उनके आराध्‍य देव है । इसी प्रकार कुल के भी संरक्षक देवता या कुलदेवी होती हें । इनका ज्ञान कुल के वयोवृद्ध अग्रजों [माता-पिता आदि ] के द्वारा अगली पीड़ी को दिया जाता है । एक कुलीन ब्राह्मण को अपने तीनों प्रकार के देवताओं का बोध तो अवश्य ही होना चाहिए -

(क) इष्ट देवता अथवा इष्ट देवी ।
(ख) कुल देवता अथवा कुल देवी ।
(ग) ग्राम देवता अथवा ग्राम देवी ।

11. द्वार👉 यज्ञ मण्डप में अध्वर्यु (यज्ञकर्त्ता ) जिस दिशा अथवा द्वार से प्रवेश करता है अथवा जिस दिशा में बैठता है