मंगलवार

इन मंदिरों में आज ही जाइए, यह वर्तमान इतिहास बनने वाला है

मंदिर का इतिहास एक बहुत ही विशाल और विविध विषय है, जिसमें भारत के अनेक प्राचीन, प्रसिद्ध और पावन मंदिरों के बारे में जानना संभव है। मंदिरों का इतिहास में हमें मंदिरों के निर्माण, संरक्षण, पूजा-विधि, महत्व, कहानी, रहस्य, चमत्कार, संस्कृति, कला, वास्तु, समाज-धर्म, आस्था, भक्ति और अन्य पहलुओं के बारे में पता चलता है।

विशेष मंदिर जैसे सोमनाथ मंदिर, बद्रीनाथ मंदिर, सोमनाथ मंदिर, तिरुपति बालाजी मंदिर और करणी माता मंदिर के बारे में कुछ प्रमुख जानकारी नीचे लिखी है, 

सोमनाथ मंदिर
12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला है, सौराष्ट्र में समुद्र के किनारे स्थित है, रीति-रिवाज के मुताबिक प्रति सोमवार को दर्शन अच्छे होते है, प्रलय के समय को सुरक्षा प्रदान करने की क्षमता रखते है। इसका निर्माण सोमराज (Chandradev) ने प्रसन्नता प्राप्ति के लिए कराया था, परन्तु 16वीं शताब्दी ई. में महमूद गजनवी (गजनवी) ने 17 बार मंदिर को लूटा और नष्ट कर दिया।

बद्रीनाथ मंदिर 
भारत के चार चार धाम तीर्थ स्थलों में से एक है। यह भगवान विष्णु को समर्पित है और उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने की थी। यह मंदिर समुद्र तल से 3,133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और बर्फ से ढके पहाड़ों से घिरा हुआ है। मंदिर अप्रैल से नवंबर तक छह महीने के लिए खुला रहता है और सर्दियों के दौरान कठोर मौसम की स्थिति के कारण बंद रहता है। यह मंदिर काले पत्थर से बनी भगवान विष्णु की मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है, जिसे विष्णु के आठ स्वयंभू रूपों में से एक माना जाता है।

तिरुपति बालाजी मंदिर
भारत के सबसे अमीर और सबसे ज्यादा देखे जाने वाले मंदिरों में से एक है। यह भगवान विष्णु के एक रूप भगवान वेंकटेश्वर को समर्पित है, और आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में स्थित है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 9वीं शताब्दी ईस्वी में पल्लव राजवंश द्वारा किया गया था। यह मंदिर वेंकटचला पहाड़ी पर स्थित है, जो शेषचलम पर्वतमाला का हिस्सा है। यह मंदिर अपने लड्डू प्रसादम के लिए प्रसिद्ध है, जिसे भक्तों को आशीर्वाद के रूप में दिया जाता है। यह मंदिर मुंडन की रस्म के लिए भी जाना जाता है, जहां भक्त भगवान के प्रति समर्पण के संकेत के रूप में अपना सिर मुंडवाते हैं।
करणी माता मंदिर
भारत का एक अनोखा और असामान्य मंदिर है। यह करणी माता, एक महिला ऋषि और देवी दुर्गा का अवतार, को समर्पित है और राजस्थान के बीकानेर जिले में स्थित है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 20वीं सदी की शुरुआत में महाराजा गंगा सिंह ने कराया था। यह मंदिर अपने चूहों के लिए प्रसिद्ध है, जिन्हें पवित्र माना जाता है और करणी माता के वंशज के रूप में उनकी पूजा की जाती है। मंदिर में हजारों चूहे हैं, जो परिसर में खुलेआम घूमते हैं और भक्त उन्हें खाना खिलाते हैं। यह मंदिर अपने सफेद चूहों के लिए भी जाना जाता है, जिन्हें शुभ माना जाता है और माना जाता है कि जो लोग उन्हें देखते हैं उनकी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं ।


आप मुझसे किसी भी मंदिर के बारे में पूछ सकते हैं, मैं आपको उसका इतिहास बताने की कोशिश करूंगा।

क्या होता है संत या बाबा ? क्या सब कुछ छोड़ कर बाबा बन जाऊं ? क्या तैयारी करनी पड़ेगी ?

यह सब जानते हैं कि बाबा बनने का निर्णय लेना एक महत्वपूर्ण और जीवन बदल देने वाला कदम होता है। इससे पहले आपको ध्यानपूर्ण विचार करना चाहिए, सभी पहलुओं का विचार करना चाहिए, और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आपका मानसिक और आर्थिक तैयारी पूरी है। बाबा बनने के फैसले को बड़े सावधानीपूर्वक और सोच-विचार करके लेना चाहिए।

अब बात आती है, संत बनूं या बाबा?
"संत" और "बाबा" दो भिन्न शब्द हैं और इनका अर्थ भाषा, संस्कृति और समाज के आधार पर बदल सकता है। यहां कुछ मुख्य भेदों को बताने की कोशिश की है:

1. शब्द का अर्थ: "संत" आमतौर पर एक आध्यात्मिक गुरु या धार्मिक आदर्श को सूचित करने के लिए उपयोग होता है, जबकि "बाबा" आमतौर पर परम पिता या आध्यात्मिक गुरु को सूचित करने के लिए उपयोग होता है।

2. आध्यात्मिक स्थान: संत आध्यात्मिक उन्नति के मार्गदर्शक और आदर्श माने जाते हैं, जबकि बाबा आध्यात्मिक बालकों के आध्यात्मिक पिता के रूप में पूजे जाते हैं।

3. सम्प्रदाय: "संत" शब्द आध्यात्मिक संप्रदायों के आध्यात्मिक गुरुओं को सूचित करने में आम होता है, जबकि "बाबा" शब्द खासतर संतमत सम्प्रदायों जैसे ब्रह्मकुमारी के प्रायः उपयोग किया जाता है।

4. व्यक्तिगत संबंध: "संत" एक आध्यात्मिक गुरु के साथ एक शिष्य का संबंध होता है, जबकि "बाबा" एक आध्यात्मिक पिता के साथ आध्यात्मिक बच्चों का संबंध होता है।

सारांश में, "संत" और "बाबा" के बीच आध्यात्मिक भाषा और संस्कृति के आधार पर भिन्नता हो सकता है, और इन शब्दों का अर्थ समाज और संप्रदाय के आधार पर बदल सकता है।
अब यदि इस संसार में, समाज में और इनकी अच्छी बुरी चीजों को देखना व सुधारना है, फ्री की एडवाइज देनी है तो बाबा बनो और अपने आप को महान बनाना है, जो शरण में आए उसका भला करना है तो संत बन जाओ।
बाबा बनने के फायदे और नुकसान निर्भर करते हैं। यह व्यक्ति के व्यक्तिगत प्राथमिकताओं, संविदानिक आवश्यकताओं और जीवन दृष्टिकोण पर निर्भर करेगा।
फायदे:
1. आध्यात्मिक आनंद: यह आध्यात्मिक सफलता और आंतरिक शांति का माध्यम हो सकता है।
2. सेवा: आपको दूसरों की सेवा करने का मौका मिलता है और उनकी मदद करने का साधु धर्म माना जाता है।
3. आध्यात्मिक शिक्षा: आप आध्यात्मिक ज्ञान और सद्गुणों की शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं।
4. जीवन का सरलीकरण: बाबा बनने से आप जीवन को सरलीकरण करने का मौका प्राप्त कर सकते हैं।
5. समाज में मान्यता: समाज में आपको आदर्श और श्रद्धा के साथ देखा जा सकता है।

नुकसान:
1. सामाजिक प्रतिबंध: बाबा बनने से आपको सामाजिक प्रतिबंध का सामना करना पड़ सकता है।
2. आर्थिक परिस्थितियाँ: आपकी आर्थिक स्थिति पर असर पड़ सकता है, क्योंकि आपको वित्तीय अद्यतन करने की कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
3. व्यक्तिगत जीवन की सीमाएँ: बाबा बनने से आपका व्यक्तिगत जीवन किसी मायके की तरह सीमित हो सकता है।
4. स्वाधीनता की खोज: बाबा बनने से पूरी तरह से स्वाधीनता की खोज में विफल हो सकते हैं, क्योंकि आपको बाबा बनने के बाद किसी आधिकारिक परिपत्र और नियमों का पालन करना पड़ सकता है।

इसलिए, बाबा बनने का निर्णय लेने से पहले आपको इन फायदों और नुकसानों को विचार करके सोचना होगा और यह निर्णय अपने व्यक्तिगत परिस्थितियों के आधार पर लेना होगा।
बाबा बनने के लिए तैयारी करने के लिए  क्या करें:

1. आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति: आध्यात्मिक ज्ञान का अध्ययन करें और आध्यात्मिक गुरुओं से सीखें।

2. आध्यात्मिक साधना: आध्यात्मिक साधना का अभ्यास करें, जैसे कि ध्यान, प्रार्थना, और मानना।

3. सेवा का आभास: दूसरों की सेवा करने का आभास करें और सेवा में लगे रहें।

4. आध्यात्मिक जीवनशैली: आध्यात्मिक जीवनशैली का पालन करें, जैसे कि सात्विक आहार और सत्य के प्रति प्रतिबद्ध रहना।

5. संगठन या सम्प्रदाय: किसी आध्यात्मिक संगठन या सम्प्रदाय का हिस्सा बनें जो बाबा बनने के लिए अधिक सहायक हो सकता है।

6. गुरु का मार्गदर्शन: किसी आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन और शिक्षा का अध्ययन करें और उनके मार्ग पर चलें।

7. स्वाध्याय: स्वयं का आत्ममूल्यांकन करें और आपके आध्यात्मिक यात्रा में सुधार करने के लिए स्वाध्याय करें।

8. सामाजिक परिपत्र और नियमों का पालन: बाबा बनने के सामाजिक परिपत्र और नियमों का पालन करें।

बाबा बनने के लिए तैयारी करने के लिए इन कदमों का अभ्यास करने से आप अपने आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं। ध्यान और समर्पण से इस मार्ग पर चलना महत्वपूर्ण होता है।

गुरुवार

भक्ति की शक्ति: एक कहानी के माध्यम से

आज आपको एक कहानी सुनाता हूं यानी पढ़ाता हूं।

पंडित और एक शिव भक्त की

एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से केदारनाथ धाम की यात्रा पर निकला। पहले यातायात की सुविधाएँ तो थी नहीं, वह पैदल ही निकल पड़ा। रास्ते में जो भी मिलता केदारनाथ का मार्ग पूछ लेता। मन में भगवान शिव का ध्यान करता रहता। चलते चलते उसको महीनो बीत गए। आखिरकार एक दिन वह केदारनाथ धाम पहुंच ही गया।
मंदिर के द्वार 6 महीने खुलते है और 6 महीने बंद रहते है। वह उस समय पर पहुचां जब मन्दिर के द्वार बंद हो रहे थे। पंडित जी को उसने बताया वह बहुत दूर से महीनो की यात्रा करके आया है। पंडित जी से प्रार्थना की – कृपा कर के दरवाजे खोलकर प्रभु के दर्शन करवा दीजिये ।
लेकिन वहां का तो नियम है एक बार बंद तो बंद। नियम तो नियम होता है। वह बहुत रोया। बार-बार भगवान शिव को याद किया कि प्रभु बस एक बार दर्शन करा दो। वह प्रार्थना कर रहा था सभी से, लेकिन किसी ने भी नही सुनी।
पंडित जी बोले अब यहाँ 6 महीने बाद आना, 6 महीने बाद यहां के दरवाजे खुलेंगे। यहाँ 6 महीने बर्फ और ढंड पड़ती है। और सभी जन वहां से चले गये।
वह वही पर रोता रहा। रोते-रोते रात होने लगी चारो तरफ अँधेरा हो गया। लेकिन उसे विश्वास था अपने शिव पर कि वो जरुर कृपा करेगे। उसे बहुत भुख और प्यास भी लग रही थी।
उसने किसी के आने की आहट सुनी। देखा एक सन्यासी बाबा उसकी ओर आ रहा है। वह सन्यासी बाबा उस के पास आया और पास में बैठ गया। पूछा – बेटा कहाँ से आये हो ? उस ने सारा हाल सुना दिया और बोला मेरा आना यहाँ पर व्यर्थ हो गया बाबा जी। बाबा जी ने उसे समझाया और खाना भी दिया। और फिर बहुत देर तक बाबा उससे बाते करते रहे। बाबा जी को उस पर दया आ गयी। वह बोले, बेटा मुझे लगता है, सुबह मन्दिर जरुर खुलेगा। तुम दर्शन जरुर करोगे।
बातो-बातो में इस भक्त को ना जाने कब नींद आ गयी। सूर्य के मद्धिम प्रकाश के साथ भक्त की आँख खुली। उसने इधर उधर बाबा को देखा, किन्तु वह कहीं नहीं थे । इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता उसने देखा पंडित जी आ रहे है अपनी पूरी मंडली के साथ।उस ने पंडित को प्रणाम किया और बोला – कल आप ने तो कहा था मन्दिर 6 महीने बाद खुलेगा ? और इस बीच कोई नहीं आएगा यहाँ, लेकिन आप तो सुबह ही आ गये।
पंडित जी ने उसे गौर से देखा, पहचानने की कोशिश की और पुछा – तुम वही हो जो मंदिर का द्वार बंद होने पर आये थे ? जो मुझे मिले थे। 6 महीने होते ही वापस आ गए !
उस आदमी ने आश्चर्य से कहा – नही, मैं कहीं नहीं गया। कल ही तो आप मिले थे, रात में मैं यहीं सो गया था। मैं कहीं नहीं गया।
पंडित जी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। उन्होंने कहा – लेकिन मैं तो 6 महीने पहले मंदिर बन्द करके गया था और आज 6 महीने बाद आया हूँ। तुम छः महीने तक यहाँ पर जिन्दा कैसे रह सकते हो ?
पंडित जी और सारी मंडली हैरान थी। इतनी सर्दी में एक अकेला व्यक्ति कैसे छः महीने तक जिन्दा रह सकता है। तब उस भक्त ने उनको सन्यासी बाबा के मिलने और उसके साथ की गयी सारी बाते बता दी। कि एक सन्यासी आया था – लम्बा था, बढ़ी-बढ़ी जटाये, एक हाथ में त्रिशुल और एक हाथ में डमरू लिए, मृग-शाला पहने हुआ था।
पंडित जी और सब लोग उसके चरणों में गिर गये। बोले, हमने तो जिंदगी लगा दी किन्तु प्रभु के दर्शन ना पा सके, सच्चे भक्त तो तुम हो। तुमने तो साक्षात भगवान शिव के दर्शन किये है। उन्होंने ही अपनी योग-माया से तुम्हारे 6 महीने को एक रात में परिवर्तित कर दिया। काल-खंड को छोटा कर दिया। यह सब तुम्हारे पवित्र मन, तुम्हारी श्रद्वा और विश्वास के कारण ही हुआ है। हम आपकी भक्ति को प्रणाम करते है।
कहने का भाव यह है दोस्तो, अपनी भक्ति को कभी कम मत करना, आपके भगवान आप पर कृप्या कम नही करेगें।
जय भोले बाबा की।